Archive for the 'घनश्याम ठक्कर' Category

15
Nov
09

जख्म दिल पर (गझल) – घनश्याम ठक्कर

जख्म दिल पर

 (गझल)

 घनश्याम ठक्कर

06
Nov
09

राधाकी व्यथा (गीत) – घनश्याम ठक्कर

30
Oct
09

Have a Very Scary Halloween – Oasis Thacker

Oasis Thacker

24
Oct
09

बीमार तेरे नामके! (गीत) – घनश्याम ठक्कर

बीमार तेरे नामके!

(गीत)

घन-’श्याम’ ठक्कर

19
Oct
09

चल तू अकेला – रवींद्रनाथ टैगोर (हिन्दी भाषांतर : घनश्याम ठक्कर)

हमारी प्राथमिक शालामें कई अभिप्रेरक कविताएं पढनेकी/गानेकी परंपरा थी. आयु के उस सूर्योदय कालमें कुछ ऐसे काव्य गाये, अपनाये,  जिनका प्रकाश आज तक जीवनपथको ज्योतिमान करता रहा है. गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोरकी इस कविताका अनुवाद गांधीजीके निकटतम अनुयायी श्री महादेव देसाईने किया था. मैंने उस अनुवादका हिन्दी भाषांतर उसी लयमें किया है. आशा है आपको पसंद आयेगा.

घ. ठ.

 

चल तू अकेला – रवींद्रनाथ टैगोर

 

(गीत)

बंगाली-गुजराती भाषांतर : महादेवभाई देसाई

गुजराती-हिन्दी भाषांतर : घनश्याम ठक्कर

 

16
Oct
09

Diwali (Festival of Lights) – Oasis Thacker

12
Oct
09

दीपावलीके त्योहारोंकी शुभकामनाएं – घनश्याम ठक्कर

02
Oct
09

घूमता है (गझल) – घनश्याम ठक्कर

 

(गझल)

घनश्याम ठक्कर

28
Sep
09

ओ रंग-रसिया (डांडिया रास) – संगीतः घनश्याम ठक्कर

ओ रंग-रसिया

 

आलबमः ओ राज रे    

गीतः लोकगीत

संगीतः घनश्याम ठक्कर

स्वरः किशोर मनराजा, दमयंती बरडाई, और साथी

डांडिया रास

Dandiya Raas

Ghanshyam Thakkar 

 

प्यारे दोस्तो

इस लोकगीतमें बात है दो प्रेमी, (पति-पत्नि)की. नवरात्रीका समय है, और पतिदेव पूरी रात घर नहीं आते है. देवीजी को यह संशय है कि उसका बांका छैला कुछ कंवारी छैलियोंके साथ  रातभर डांडिया-रास खेलकर आया है!  सुबहमें प्रियतम घर आते हैं तो स्पष्टतः प्रियतमाको कुछ प्रश्न है. लेकीन वह डंडा ले कर पुलिसकी तरह नहीं पूछती है, “Where the hell have you been all night, you son of a squirrel?” उसके बदलेमे प्यारे प्रोसीक्युटरकी तरह ‘रंगरसिया’ जैसा रंगीला संबोधन लगाकर पूछती है, “ओ.. रंगर्सिया, कहां गया था रातभर रास खेलनेको?  ये जागरणसे भरी लाल अंखियां क्युं?” लेकिन प्रियतमभी बेवकुफ नहीं है, एक चालाक डिफेंडेंटकी तरह जेबमेंसे सोनेके पैंजनेकी जोड निकालके कहता है, ‘अरे पगली, मैतो देर रात तक सुनारके यहां था,  तेरे लिये ये कस्टम-मेइड झांझर बनवानेमें कमबख्त सुबहा हो गई.” लेकिन प्रोसिक्युटर प्रियतमाको अभी ऐतबार नही होता है. वह फिरसे यही प्रश्न पूछती है. पतिदेव दूसरी जेबमेंसे चूडियां निकालकर कहता है, ” अरी, मैं तो चूडियां बनानेवालेके यहां भी गया था. इतनी सुंदर चूडियां बनानेमें सुबह हो गई!!”

मेरे ब्लोगके महार्थक मेहमान! अब फैंसला आपके हाथमें है. कॉमेंट विभागमें जवाब लिखिये किः

१. क्या ये प्रियतम सच कह रहा है, कि उसने पूरी रात पत्नीके लिये गहने बनवानेके लिये बितायी?

२. या वह सचमुच गोरीयोंके साथ रास खेलने गया था, और बहाने + रिश्वतके लिये गहने पहलेसे बनवाकर रख्खे थे?

कोमेंट विभागमें जवाब लिखिये.

घनश्याम ठक्कर
 

  

  

 

 

 

  

   

 

 

  

  

 

 

 

  

   

 

 

  

  

 

 

 

  

   

 

 
26
Sep
09

ओ राज रे (हीच – गरबा) – संगीतः: घनश्याम ठक्कर

 

ओ राज रे (हीच – गरबा)

 

संगीतः: घनश्याम ठक्कर

गीतः लोकगीत और घनश्याम ठक्कर

 

       

स्वरः जयश्री भोजविया और साथी




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