गणतंत्र दिन की शुभकामनाएं
मेरा २०११ का हीट-लीस्ट – घनश्याम ठक्कर
घनश्याम ठक्कर का और ओएसीस थाकर का हीट-लीस्ट
Ghanshyam Thakkar’s and
Oasis Thacker’s Hit List
दोस्तो,
मैं पोस्ट प्रकाशित करते समय स्टॅट्स के बारे में सोचता नहीं हूं. मुझे जो सुयोग्य लगे उन्हें प्रकाशित करता हूं. लेकिन सालमें एकबार कुतूहल के खातिर उन्हें देखने में मजा आता है. दो मुख्य मेहमान देश, भारत और यु.एस.ए के अतिरिक्त करीब १२० देशके नागरिकों ने दोनो वेबसाइट/ब्लोग का लाभ लिया, यह दिली है.
घनश्याम ठक्कर
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हेप्पी न्यु यर … साल मुबारक – घनश्याम ठक्कर [Ainvayi Ainvayi वाद्य संगीत रीमिक्स MP3ઃ Ghanshyam Thakkar ]
प्यारे दोस्तों
नए साल के लिए मेरी शुभकामनाएं
घनश्याम ठक्कर
Ainvayi Ainvayi
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Original Score: Salim – Sulaiman
Instrumental Music Remix: Oasis Thacker
[Ghanshyam Thakkar]
क्रिसमस की शुभकामनाएं – – घनश्याम ठक्कर (ओएसीस)[You Light Up My Life (MP3 Instrumental Remix)] – Ghanshyam Thakkar (Oasis)
Merry Christmas From Ghanshyam Thakkar
्सभी दोस्तों को क्रिसमस की शुभकामनाएं
You Light Up My Life
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(MP3 Instrumental Remix)
by Ghanshyam Thakkar (Oasis Thacker)
Original Song by Debby Boone
Original Music Score by Joe Brooks
जीवन में हम बहुत सारे गाने पसंद करते हैं, लेकिन कुछ गाने ऐसे होते हैं जिनके पहली बार सुनने का स्थल और समय हमें हमेशा याद रहता है. यह गीत मेरे लिये ऐसा गीत है. १९७७ में फोर्टवर्थ टेक्सास की मकार्ट स्ट्रीट पर ऑफिस जाते समय यह गीत मेरी कार के रेडियो पर पहली बार सुना था. और सुनते ही पसंद आ गया. ऑफिस पहूंचकर मैंने दोस्त को गीत की गायिका का नाम पूछा. उसने कहाः डेबी बून. खूबसूरत डेबी बहूत प्रसिद्ध गायक, संगीतसर्जक और टी. वी. होस्ट पॅट बून (जो अपने हेन्डसम रूप के लिये भी प्रसिद्ध है) की बेटी है. ५०’ के दशक के दौरान म्युझिक चार्ट के रेकॉर्ड के लिये एल्वीस प्रेस्ली के बाद उनका पहला नाम था. ‘यु लाइट अप माय लाइफ’ रिलीझ होने से पहले डेबी पॅट बून की बेटी थी. रिलीझ के बाद पॅट साब को लोग ‘डेबी बून के डेडी’ से पहचानने लगे. कोई भी पिता ऐसे डिमोशन के लिये हमेंशा खुश होता है. डेबी के यह गीतने तब तक के सब रॅकोर्ड तोडे, और ऑस्कार, ग्रेमी और गोल्डन ग्लोब सहीत, संगीत और मनोरंजन जगत के हर ऍवोर्ड को हासिल किया.
गीत अधिकतर उसकी स्वररचना और गायकी के लिये प्र्सिद्ध होते हैं, और गीत के शब्दो की सफलता पर ज्यादा असर नहीं होती है. इसी लिये कुछ बहुत साधारण गीति (लिरीक) वाले गीत भी सफल हो जाते हैं. गीति के पास से कविता के स्तर की उम्मीद तो नहीं होती है, लेकीन कलात्मक शब्द और भाव से बनी गीति और अच्छे संगीत का समन्वय सुवर्ण में सुगंधी मिली हो उस तरह निखरते हैं. यह गीत की गीति बहुत उच्च कक्षा की है.
बचपन की मोहोबत को (संगीत रिमिक्सः घनश्याम ठक्कर) Bachpan Ki Mohobat Ko (MP3):Music Remix: Oasis Thacker
Bachpan Ki Mohobat Ko
बचपन की मोहोबत को
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(MP3):
Instrumental Music Remix & Performance:
Oasis Thacker
( Ghanshyam Thakkar)
Music Original Score: Naushad
वाद्य रिमिक्स ઃघनश्याम ठक्कर ‘ओएसीस’
संगीतकारः नौशाद
फिल्म ः बैजू बावरा
Film Baiju Bavra (1952)
‘बैजू बावरा’ अभिनय, कहानी, निर्देशन और संगीत के बिंदु से बॉलीवुड की सबसे उत्कॄष्ठ फिल्मों में से एक है. तानसेन और शहेनशाह अकबर के समकालिन बैजू भारतीय शास्त्रीय संगीत में योगदान देने वाली महत्वपूर्ण प्रतिभा है.
लेकिन अच्छी कहानी के लिये यह पर्याप्त नहीं है. अकवर कला-प्रेम और संगीत-प्रेम के लिये और अच्छे कलाकारों का सन्मान करने के लिये मशहूर है. जैसे पुराने रोमन साम्राज्य में सम्राट अपने और प्रजा के मनोरंजन के लिये Fight till death शर्तवाले duals रखते थे, यहां श्हेनशाह असाधारण द्वंद्व का आयोजन करते है. दो संगीतकारों के बीच संगीतस्पर्धा आज भी होती है. लेकिन यहां शहेनशाह का तरंग नये प्रकार के संगीत द्वंद्व की घोषणा करते हैं. ‘राज्यमें से कोई भी अकबर के प्रधान संगीतकार तानसेन को चुनौती दे सकता है, लेकिन अगर वह हार जाये तो उसे सजाये मौत मील सकती है. ऐसे अच्छे शाशक भी कभी कभी पागलपन दिखा सकते थे. खैर, ऐसे ही पागलपन के साथ छोटे गांव का संगीतकार बैजू यह चुनौती उठाता है, और जिस प्रेमिका के पीछे वह पागल (बावरा) था उसे छोड कर जाता है. हारता है. लेकिन अकबर उसे जीवनदान देते हैं फिल्ममें यह गीत बैजू की प्रियतमा विदाय के समय गाती है.
इस लेख का उद्देश्य फिल्म की कहानी कहने का नहीं है, लेकिन गीत/संगीत के लिये भाव की पूर्वभूमिका तैयार करनेका है.
बात ‘मोहोबत’ की नहीं, ‘बचपन की मोहोबत’ की है. फर्क है. बचपनमें निर्दोश प्रेम की जो सच्चाई होती है वह उम्र बढने के साथ स्वार्थ, अभिमान आदि विकार से कलुषित होती है.
लेकिन केबल टीवी और इन्टरनेटके आगमन के बाद बचपन और वयस्कता के बीच की लक्षमणरेखा पतली हो गई है. जो कचरा वयस्कों के लिये तैयार होता है वह बच्चोंको भी उअपल्ब्ध है.
नौशाद साहब और कुछ नहीं करते, और सिर्फ ‘मोगले आझम’ और ‘बैजू बावरा’ में संगीत देते, तो भी उन्हें मैं दुनिया के श्रेष्ठ संगीतकारों के समुहमें शामिल करता.
थॅंक्सगिवींग दिन की शुभकामनाएं – घनश्याम ठक्कर
सब दोस्तों को मेरे हार्दिक ‘हॅपी थेन्क्सगिवींग’. मेरे ब्लॉग और वेबसइट पर मेहमान बनने के लिये धन्यवाद
घनश्याम ठक्कर
Old Proverb / New Proverb-1 – Oasis Thacker
Oasis Thacker
If You Can’t Stand Heat…….
Old Proverb
New Proverb
वैष्नवजन: वाद्यसंगीत [सितार, पियानो, गिटार] – घनश्याम ठक्कर (ओएसीस)
शास्तीय और जाझ संगीत का सुभग समन्वय
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अगर आपने रिचार्ड एटनबरो की अंग्रेजी फिल्म ‘गांधी’ देखी होगी तो शायद उसके टाईटल का, गांधीजी का सबसे प्रिय भजन, ‘वैश्नवजन’ याद होगा. गीत की कुछ पंक्तियों टाइटल में गायी गई है, और फिल्मके संगीतकार और सितारमॅस्ट्रो पंडित रविशंकरने सितार पर गीत की छोटी सी धून मधुर सूर में बजायी थी. गांधीजी का यह सबसे प्रिय भजन था, और हमेशां प्रार्थना में गाया जाता था. यह गीत नरसिंह महेता ने पंद्रहवीं शताब्दी में लिखा था. नरसिंह गुजराती भाषा के आद्य और मीरा, कबीर जैसे महान भक्तकवि थे, जिन्होंने कभीं गहरी फिलोसोफी युक्त तो कभी अनपठ भी समज सके ऐसी लोकबोली में उच्च जीवन जिनेका सबक सिखाया. वे काव्यसर्जन में तो अपने काल से ४०० साल आगे तो थे, लेकिन सामाजिक समानता के विषय में इससे भी ज्यादा प्रगतीशील थे. नरसिंह ब्राह्मण ज्ञाति के भी सबसे ऊंचे नागर कुल में पैदा हुए थे. उस काल में नागर वैष्य के घर का भी पानी नहीं पीते थे, तब नरसिंह अछूतों की बस्ती में जा कर भजन किया करते थे. इसके लिये उनको जाति बाहर निकाले गये, और कुछ और भी मुसीबतों का सामना पडा. ऐसे विरल विभु के लिये मेरा सर झुकता है. (और मेरा सर इतनी आसानी से नहीं झुकता है)
शक्य है कि गांधीजी ने पांचसो साल बाद अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में अछूतों को रखने का निर्णय नरसिंह की प्रेरणा से लिया हो, और इसी लिये ‘वैष्नवजन’ उनका सबसे प्रिय भजन हो. (नरसिंह के विचार और आचार में बिलकुल तफावत नहीं था.) पांचसो साल के बाद भी गांधीजी को बहुत विरोध का सामना करना पडा. कोचरब आश्रम के लिये डोनेशन आने बंध हो गये, और आश्रम बंध करने की स्थिति आ गई. एक दीन अहमदाबाद के वीर उद्योगपति अंबालाल साराभाई (वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के पिताजी) की कार आश्रम के पास खडी रही, और उन्होंने गांधीजी को आश्रम के लिये बडा डोनेशन दिया. मेरा ये सद्भाग्य है कि मैं ऐसे पवित्र आश्रम की पड़ोस में बडा हुआ था.



